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मंत्री के सामने छुट्टा पशु ने खोली शहर की व्यवस्था की पोल

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कलेक्ट्रेट गेट से लेकर प्रमुख मार्गों तक सड़कों पर घूम रहा गोवंश, अभियान और खर्च के बावजूद नहीं थम रही समस्या

आरिफ सिद्दीकी

शाहजहांपुर। शहर में छुट्टा गोवंश की समस्या अब केवल आम राहगीरों के लिए परेशानी का कारण नहीं रह गई है, बल्कि यह सरकारी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करने लगी है। इसका ताजा उदाहरण उस समय देखने को मिला, जब प्रदेश के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना हनुमत धाम से बाइक पर सवार होकर अपने आवास दीवान जोगराज जा रहे थे। रास्ते में अचानक एक छुट्टा पशु बाइक के सामने आ गया। गनीमत रही कि बाइक चला रहे भाजपा महानगर उपाध्यक्ष श्याम बाबू दीक्षित ने समय रहते बाइक दूसरी दिशा में मोड़ दी और बड़ा हादसा टल गया।

मंत्री के सामने अचानक छुट्टा पशु आ जाने की घटना ने शहर की व्यवस्थाओं को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आम नागरिक रोजाना जिन समस्याओं का सामना करते हैं, वही समस्या अब वीआईपी आवागमन के दौरान भी सामने आ गई। सवाल यह है कि जब प्रदेश सरकार के एक मंत्री शहर में हों और उनके आवागमन की जानकारी संबंधित विभागों को हो, तब भी प्रमुख मार्ग पर छुट्टा पशु कैसे पहुंच गया?


सुरक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में

मंत्री के आवागमन के दौरान सड़क पर अचानक छुट्टा पशु आ जाना केवल नगर निगम की व्यवस्था का मामला नहीं है, बल्कि सुरक्षा इंतजामों पर भी सवाल खड़े करता है। यदि बाइक चालक ने समय रहते नियंत्रण नहीं संभाला होता तो गंभीर दुर्घटना हो सकती थी।

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वीआईपी आवागमन के दौरान संबंधित मार्ग की निगरानी किस स्तर पर की जा रही थी और सड़क पर मौजूद संभावित खतरों को दूर करने की जिम्मेदारी किसकी थी।

कागजों में अभियान, सड़कों पर गोवंश

शहर में छुट्टा पशुओं को पकड़ने के लिए समय-समय पर अभियान चलाए जाने के दावे किए जाते हैं। गोवंश को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, संरक्षण केंद्रों की व्यवस्था और सड़कों से पशुओं को हटाने पर सरकारी धन भी खर्च होता है। इसके बावजूद शहर के प्रमुख मार्गों पर छुट्टा पशु दिखाई देना इन अभियानों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।

यदि अभियान लगातार चल रहे हैं तो फिर सड़क पर गोवंश की मौजूदगी क्यों बनी हुई है? यदि पशुओं को पकड़ा जा रहा है तो वे दोबारा सड़कों पर कैसे पहुंच रहे हैं? और यदि उन्हें संरक्षण केंद्रों में भेजा जा रहा है तो वहां से उनकी निगरानी कौन कर रहा है?

कलेक्ट्रेट गेट के बाहर भी नहीं सुधरी स्थिति

सबसे गंभीर बात यह है कि कलेक्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण सरकारी परिसर के मुख्य गेट के बाहर भी आए दिन गोवंशीय पशु सड़कों पर बैठे या घूमते दिखाई देते हैं। यहां से अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, कर्मचारियों और आम फरियादियों का लगातार आवागमन रहता है।

इसके बावजूद यदि कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील और प्रमुख स्थान के बाहर भी छुट्टा पशुओं पर प्रभावी नियंत्रण नहीं है तो शहर के दूसरे इलाकों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

हादसा होने के बाद जागेगा सिस्टम?

शहर में छुट्टा पशुओं के कारण पहले भी सड़क दुर्घटनाओं का खतरा बना रहता है। राहगीरों और दोपहिया वाहन चालकों के लिए सड़क पर अचानक सामने आ जाने वाला पशु जानलेवा साबित हो सकता है। सवाल यह है कि प्रशासन और नगर निगम किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं या समस्या का स्थायी समाधान किया जाएगा?

मंत्री के सामने हुई यह घटना व्यवस्था के लिए एक चेतावनी मानी जा सकती है। अब जरूरत केवल पशुओं को पकड़ने के अभियान की तस्वीरें दिखाने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि सड़क से पकड़े गए पशु दोबारा सड़क पर न लौटें।

नगर निगम की जवाबदेही तय करने की जरूरत

छुट्टा पशुओं की समस्या पर नगर निगम की जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। केवल अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। अभियान के बाद पशुओं को कहां रखा गया, उनकी टैगिंग और निगरानी कैसे हो रही है, कितने पशु पकड़े गए, कितने संरक्षण केंद्रों में भेजे गए और दोबारा सड़क पर आने वाले पशुओं को रोकने के लिए क्या व्यवस्था है—इन सभी सवालों का सार्वजनिक रूप से जवाब सामने आना चाहिए।

मंत्री के सामने छुट्टा पशु आना महज एक संयोग नहीं, बल्कि उस जमीनी हकीकत का आईना है जिसे शहरवासी लंबे समय से झेल रहे हैं। अब देखना यह है कि इस घटना के बाद नगर निगम और प्रशासन व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाते हैं या मामला भी रोजमर्रा की दूसरी समस्याओं की तरह फाइलों में दबकर रह जाता है।

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